दिल्ली के महीपलपुर गांव में 37 वर्ष पुरानी कानूनी दलित बस्ती को ध्वस्त करने की साजिश का सच

 

दिल्ली के महीपलपुर गांव में 37 वर्ष पुरानी कानूनी दलित बस्ती को ध्वस्त करने की साजिश का सच

यह बस्ती 20 सूत्रीय कार्यक्रम के तहत गांव के भूमिहीन दलित एवं पिछड़े परिवारों को 1980 में ग्राम पंचायत ने पंचायती राज विभाग और एसडीएम दिल्ली प्रशासन के आदेश पर पुनर्वास कानून के तहत आवंटित की थी।। 120 – 120 वर्ग साइज के यह कुल 51 प्लॉट्स थे जो गांव के ही वाल्मीक, जाटव, जुलाहे और कुम्हार परिवारों को आवंटित किए गए थे।।
इन प्लॉट्स के साथ ही गांव की बहुत सी खाली जमीन थी जो कालांतर में डीडीए के पास आ गई और यहां डीडीए के भृष्ट अधिकारियों की मदद से भू माफिया ने खाली जमीनों पर अवैध कब्जे कर लिए।।
पहले यह जमीन गांव के वीरान किनारे पर थी जहां गांव की पूरी गंदगी फैंकी जाती थी इसलिए यहां कोई बसने नहीं आता था, इस जमीन का व्यावसायिक उपयोग तो कुछ था ही नहीं इसलिए इस जमीन पर पहले किसी का विशेष ध्यान नहीं था केवल गांव के दलित पिछड़े ही यहां अपने टूटे फूटे बदबूदार मकानों में रहने को अभिशप्त थे।।
अचानक डीडीए ने यहां महीपलपुर बाईपास निकाल दिया और साथ ही केंद्रीय औधयौगिक सुरक्षा बल को एक बड़ा भूखंड जो दर्जनों एकड़ का था आवंटित कर दिया।। जैसे ही यहां बड़ा बाईपास और cisf का कैम्प गुलजार हुआ रातों रात बिल्डर्स ने अवैध कब्जे वाली जमीनों पर बड़े बड़े मॉल गोदाम ऑफिस काम्प्लेक्स और मल्टीस्टोरी फ्लैट्स बना दिये।।
किसी ग्रामीण आरटीआई कार्यकर्ता ने डीडीए में आरटीआई भेजकर इन अवैध भवनों के कानूनी स्टेटस के बारे में सूचना मांग ली।। फिर क्या था हाथ पांव फूल गए डीडीए के अधिकारियों के और उन्होंने अवैध भवनों में नाम चारे के लिए 4 छह हथौड़े मार दिए।।

अवैध किन्तु आलीशान भवनों के साथ ही दिल्ली सरकार द्वारा वित्तपोषित और आवंटित दलित बस्ती जो कि कानूनी थी इन बिल्डर्स और भृष्ट अधिकारियों के लिए संजीवनी बन गई, बिल्डर्स ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम के तहत आवंटित कुछ प्लॉट्स गैरकानूनी रूप से और तोड़फोड़ का भय दिखाकर खरीद लिए।। इन खरीदे गए प्लॉट्स पर भी बड़े बड़े भवन बना दिये गए।।
कुछ थोड़ा सम्पन्न दलितों ने अपने प्लॉट्स नहीं बेचे तो उन्हें डराया धमकाया गया और उनके खिलाफ झूठे मुकदमे बनवाये गए।। इतने पर भी दलितों ने अपने प्लॉट्स नहीं बेचे तो बिल्डर्स ने डीडीए अधिकारियों से मिलकर पूरी दलित बस्ती को बुलडोजर चलाकर 30 मई 2017 से उजडवाना शुरू कर दिया जो आज तक बुलडोजर का कहर जारी है।।
1 जून 2017 को गांव के पीड़ित उपराज्यपाल से भी मिले जिसपर उपराज्यपाल ने डीडीए को 20 सूत्रीय कार्यक्रम वाले मकानों पर बुलडोजर न चलाने को कहा किन्तु डीडीए ने यह कहकर कि यही मकान 20 सूत्रीय कार्यक्रम में मिले थे इस बात की कोई पहचान नहीं हो पा रही है इसीलिए यह अवैध हैं और इन्हें हम तोड़ेंगी ही।।

डीडीए अधिकारियों ने उपराज्यपाल के निर्देशों को मानने से इनकार कर दिया और उपराज्यपाल को भी गुमराह कर दिया।।
बुलडोजर के साथ डीडीए के कोई अधिकारी साथ नहीं चलते केवल मजदूर और भारी पुलिस बल मौके पर होता है और गरीबों के मकानों पर कहर बरसा रहा है।।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दिन 2014 में शपथ ली थी उसी दिन दिल्ली का वह विशेष कानून खत्म हो रहा था जिसमें गांवों की बढ़ी हुई आबादी यानी अनधिकृत कालोनियों को तोड़ने पर रोक लगाता था, मोदी सरकार ने सबसे पहले संसद का विशेष सत्र बुलाकर इसी कानून को बनाया था और कहा था 2014 तक बने किसी भी मकान को नहीं तोड़ा जाएगा।। यह कानून राष्ट्रपति के आदेश पर गजट में भी प्रकाशित हुआ है और इसी कानून के तहत दिल्ली की किसी भी अवैध कालोनी में अभी तक कोई तोड़फोड़ नहीं हुई है।।

किन्तु महीपाल पुर में डीडीए अधिकारियों ने इस कानून को तो ठेंगा नहीं दिखाया अपितु उन मकानों को तोड़ दिया जो कानूनी थे और जिन्हें खरीदने बेचने तक पर पाबंदी थी।। डीडीए अधिकारियों की काली करतूत और बुलडोजर के भय से अब सभी दलित यहां बने अपने सब मकानों को बेचने पर राजी हो गए हैं और बहुत जल्द यहां बिल्डर्स अपने आलीशान भवन बनाकर इस इलाके को गुलजार करेंगे। दलितों के यह प्लॉट्स जो बिल्डर्स द्वारा बनाई गई अट्टालिकाओं को पहले प्रदूषित कर रहे थे अब यही प्लॉट्स बिल्डर्स की अवैध बिल्डिंग्स को जीवनदान देंगे।।
पूरा खेल अब भी किसी की समझ में न आया हो तो वह एक दिन महीपाल पुर घूम आये और वहां खुद जाकर देख ले इस पूरे षड्यंत्र को।।।