सोशल मीडिया का जहर: विजय कुमार सिंह

दहकते आग के गोले पर बैठ गया है मनुष्य, ?????
मीडिया का काम है आपको सच्चाई बताना. मुमकिन है कि कई बार मुख्य धारा का मीडिया यानी ज़िम्मेदार टीवी चैनल या वेबसाइट या अख़बार वग़ैरह आपको पूरा सच नहीं बता पाएं, या देर से बताएं, या पहले कुछ बताया हो और बाद में कुछ और बताने लगें. लेकिन फिर भी ये बेहतर होगा कि आप ज़िम्मेदार मीडिया पर ही यक़ीन करें. क्योंकि सोशल मीडिया पर यक़ीन करके आप न सिर्फ़ अफ़वाहों के चंगुल में फंसते हैं, उसे हवा देते हैं और समाज को अराजकता के दलदल में ढकेलने का माध्यम बनते हैं. सोशल मीडिया ने आज विश्वसनीयता का अपूर्व संकट खड़ा किया है. इसकी ज़्यादातर ख़बरें ग़लत और दुर्भावनापूर्ण होती हैं. सोशल मीडिया पर मुट्ठीभर ग़ैरज़िम्मेदार लोग सक्रिय हैं. लेकिन ये लोग पलक झपकते ही करोड़ों लोगों को अपना हथियार बना लेते हैं.

 

कोई ऐसा मामला नहीं है, जिस पर आपको ख़ून खौलाने वादा सन्देश मिला हो और उस सन्देश की सारी बातें सही रही हों. इसीलिए सोशल मीडिया की अफ़वाहों को ख़बर समझकर उन पर त्वरित टिप्पणी करने या फॉरवर्ड या शेयर करने से बचिए. पूरे तथ्यों के सामने आने का इंतज़ार कीजिए. फिर अपनी बात कहिए. अधकचरी बातों को आगे बढ़ाने से बचिए, वर्ना ये आपको भी नहीं बख़्शेगा. दिल्ली पुलिस साफ़ कर चुकी है कि डॉ पंकज नारंग की निर्मम हत्या की वजह साम्प्रदायिक नहीं थी. गिरफ़्तार नौ आरोपियों में से पांच हिन्दू हैं. हिन्दूओं में चार नाबालिग़ हैं. इसलिए उनका नाम नहीं लिया जा रहा. डॉ नारंग का पहली बार जिन दो आरोपियों से झगड़ा हुआ था, उनमें से भी एक हिन्दू है. चारों मुस्लिम आरोपी मुरादाबाद के रहने वाले हैं. कोई बांग्लादेशी नहीं है.

 

बेशक, ये वाकया भी उतना ही शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है, जितना अख़लाक़ की हत्या या अन्य उन्मादी घटनाएं. दोषियों को सख़्त सज़ा मिलनी ही चाहिए. लेकिन ज़रा सोचिए कि अगर डॉ नारंग की हत्या के बाद फ़ैलायी गयी अफ़वाहों की वजह से दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठते तो क्या उसमें होने वाला नुक़सान आपका नहीं होता. दंगों में नुक़सान इधर ज़्यादा हुआ या उधर, पहला पत्थर किसने फेंका, इधर से या उधर से? यक़ीन जानिए, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ये बुरा वक़्त है. इसमें विभाजनकारी ताक़तें एक-दूसरे को मज़बूत करने में जुटी हैं. सतर्कता ही इसका इलाज़ है.

 

मौजूदा दौर में सोशल मीडिया ने आम आदमी को परमाणु या रासायनिक हथियारों से भी कहीं ज़्यादा विध्वंसक अस्त्र थमा दिया है. ये इंसान के ज्ञात इतिहास में अपूर्व है. संचार क्रान्ति का ये अद्भुत लेकिन भयावह रूप है. ये मगरमच्छ की सवारी है, जो इसे सफ़लतापूर्वक भी कर लेगा उसे भी ये मार डालेगा. ये आधुनिक भस्मासुर है, जिसके सिर पर इसका हाथ होगा उसका भस्म होना तय है. ये ‘बन्दर के हाथ आया नारियल’ भी है जो किसी मासूम की ही जान लेगा. भारत में ये बीमारी तो दो-चार साल ही पुरानी है. विकसित देश तो इसका दंश दशक भर से भुगत रहे हैं.

 

भारत में सोशल मीडिया का सबसे पहला चमत्कार निर्भया कांड के वक़्त सामने आया. पूरे सरकारी तंत्र को हवा ही नहीं लगी कि समाज में क्या अन्तःधारा (Under Current) बह रहा है. तब बड़े नेता और अफ़सर पिछली पीढ़ी के थे. उनकी टेबल पर रखा कम्प्यूटर एक सजावटी सामान होता था. आज भी 50 साल से अधिक उम्र वाले 80 फ़ीसदी अफ़सर कम्प्यूटर या स्मार्टफ़ोन को ठीक से चलाना और टाइप करना वग़ैरह नहीं जानते. लेकिन ज़्यादातर युवाओं के हाथ में स्मार्टफ़ोन पहुंच चुका है. गांव हो या शहर, अमीर हो या ग़रीब, स्मार्टफ़ोन ने कई खाईयों को पाटा है. ये जेब में आ जाने वाले सस्ते और चलते-फ़िरते कम्प्यूटर हैं.
संचार क्रान्ति के इसी वाहन ने अन्ना आन्दोलन की सफ़ल गाथा लिखी. अरविन्द केजरीवाल को सत्ता तक पहुंचाने में भी स्मार्टफ़ोन की बड़ी भूमिका थी. अरविन्द जब स्मार्टफ़ोन की सवारी कर रहे थे तब उनके प्रतिद्वन्दी पुरानी पीढ़ी की उन बैलगाड़ियों पर थे जिसे हम जातिवाद और क्षेत्रवाद के फ़ार्मूले वाली राजनीति के रूप में देखते आये हैं. लेकिन सोशल मीडिया की वो आंधी देशव्यापी नहीं हो सकी. क्योंकि स्पार्टफ़ोन की दिल्ली जैसी मौजूदगी और उसके डाटा सिग्नल की रफ़्तार देश के बाक़ी हिस्सों में नहीं थी. केजरीवाल के बाद बीजेपी ने भी सोशल मीडिया का मंत्र बहुत तेज़ी से थामा. संघ के कार्यकर्ताओं, चिन्तकों और विचारकों ने अपनी युवा टीम को बहुत बढ़िया से सम्भाला.

 

चरित्र हनन के ऐसे-ऐसे सन्देश लिखे और फ़ैलाये गये जिसे राजनीतिक मंचों पर बोल पाना मुमकिन नहीं था. हिन्दुत्ववादी बातें, मुस्लिम विरोधी सन्देश, तरह-तरह के घोटालों का सच्चा-झूठा ब्यौरा और भी न जाने क्या-क्या – सब कुछ इतनी तेज़ी से एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल तक दौड़ने लगा जैसा इस देश ने पहले कभी अनुभव नहीं किया था. सोशल मीडिया ने हरेक भ्रष्ट सन्देश को पलक झपकते ही करोड़ों लोगों तक पहुंचा दिया. प्रेषक का पता-ठिकाना छद्म ही बना रहा. इसे ‘मैनेज़’ करने की बहुत सारी दुकानें धड़ाधड़ खुलने लगीं. दुकानों पर ग्राहक भी ख़ूब उमड़े. सोशल मीडिया की सूनामी ने जैसे कांग्रेस का सत्यानाश किया, वैसे ही ये बाक़ियों का भी बुरा हाल करेगी. सबके ख़िलाफ़ झूठे-सच्चे प्रचार की आग धधकेगी. ये आग किसी को भी नहीं बख़्शेगी.

 

देखते ही देखते WhatsApp, FaceBook और Twitter जैसे हथियार अजेय हो गये. WhatsApp तो चलता-फिरता और पोर्टेबल विश्वविद्यालय बन गया. जहां अपरिचित लोग एक-दूसरे के अघोषित प्रोफ़ेसर बन गये. विषाक्त सन्देश पाने वाले लोगों के ऐसी क्षमता नहीं होती कि वो तथ्यों की सत्यता परख सकें. वो अधकचरी सूचनाओं और व्याख्याओं को ही परम ज्ञान समझने लगते हैं. ऐसे ज्ञान ने समाज को ग़रीबी-अमीरी के फ़न्दे से मुक्त कर दिया. लेकिन साम्प्रदायिक दलदल में ढकेल दिया. राष्ट्र-भक्ति, घोटाले, ‘अच्छे दिन’ जैसे तमाम नारों को सोशल मीडिया ने मामूली से ख़र्च की बदौलत इतनी तेज़ी से घर-घर पहुंचा दिया जैसा पहले कभी नहीं हुआ.

 

सैकड़ों लोगों की अघोषित फ़ौज आज दिन-रात सोशल मीडिया पर खेल रही है. सैकड़ों बेवसाइट्स पर लगातार नज़र रखी जाती है. कहीं कुछ सकारात्मक दिखा तो फ़ौरन Likes, Retweet, Share, Trending जैसी बयार बहने लगती है. नकारात्मक है तो तुरन्त यही ‘भाड़े के टट्टू’ राशन-पानी लेकर पिल पड़ते हैं. आलोचनात्मक दृष्टि रखने वालों को फ़ौरन दोग़ला, ग़द्दार, क़ौम का दुश्मन, राष्ट्र-द्रोही, बिकाऊ, तनखय्या, प्रेस्टीच्यूट, दलाल मीडिया जैसे तमगों से अलंकृत किया जाता है. ऑनलाइन अभद्र ग़ालियां लिखी जाती हैं. लिखने वाले लोग मुट्ठीभर होते हैं. लेकिन उनके पास सैकड़ों की संख्या में Login ID, User name और Email IDs होती हैं. इनको बाक़ायदा ‘संगठन’ से निर्देश मिलते हैं कि किसका क्रियाकर्म कैसे करना है?

इसी तंत्र की सक्रियता का नतीज़ा है कि आज आप सोशल मीडिया पर यदि आम आदमी पार्टी या बीजेपी की आलोचना करेंगे तो शायद उसे कोई सुन-पढ़ भी ले. लेकिन ज़रा अरविन्द केजरीवाल और नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ फुसफुसाकर तो देखिए. ‘लोग’ पलक झपकते ही आपकी कपाल-क्रिया तक कर डालेंगे. आपको ये फ़ासिस्ट तरीक़ा लगता है, तो लगा करे.

 

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आज़ादी को ‘अभिव्यक्ति की अराजकता’ में बदल दिया है. ये अराजकता आज जिसकी ताजपोशी करेगी, कल उसी का तख़्ता पलट भी करेगी. सोशल मीडिया हमें अराजकता की प्रतिस्पर्धा में ढकेल चुका है. अब जो ज़्यादा अराजक होगा, वही सरताज बनेगा. ये अराजकता किसी क़ानून से क़ाबू में नहीं आएगी. ये समाज को और मूल्य विहीन करेगी. सनकी प्रवृत्तियों को बढ़ाएगी. अनुशासन और शर्म-ओ-हया को क़िताबी बना देगी. इंसान के लिए ये बारूद से भी कहीं ज़्यादा विध्वंसक होगा।

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